*ऋषि चिंतन
🎃🎃🎃🎃🎃🎃🎃🎃🎃
🌴//२८फरवरी २०१७ मंगलवार //🌴
🌱फाल्गुन शुक्लपक्ष द्वितीया२०७३ 🌱
🎃🎃🎃🎃🎃🎃🎃🎃🎃
🙏🙏🙏
‼ *प्रणाम*‼
❗ *ऋषि चिंतन*❗
*विवेक ही हमारा सच्चा मार्गदर्शक*
👉 *विवेकशीलता को ही सत्य की प्राप्ति का एकमात्र साधन कहा जा सकता है।* सत्य को नारायण कहा गया है, भगवान का सर्वाधिक सारगर्भित नाम सत्यनारायण है। यथार्थता के हम जितने अधिक निकट पहुंचते हैं भगवान के सान्निध्य का, उसके दर्शन का उतना ही लाभ लेते हैं। *हीरा पेड़ों पर फूल की तरह लटका नहीं मिलता, वह कोयले की गहरी खदानें खोदकर निकालना पड़ता है। सत्य किसी को अनायास ही नहीं मिल जाता, उसे विवेक की कुदाली से खोदकर निकालना पड़ता है।*
👉 दूध और पानी के अलग कर देने की आदत हंस में बताई जाती है। इस कथन में त अलंकार मात्र है, पर यह सत्य है कि *विवेक रूपी हंसवृत्ति उचित और अनुचित के चालू सम्मिश्रण में से यथार्थता को ढूंढ़ निकालती है और उस पर चढ़े हुए कलेवर को उतार फेंकती है।*
शरीर की आंतरिक स्थिति का सामान्यतः कुछ भी पता नहीं चलता, पर रक्त ‘एक्सरे’ मल-मूत्र आदि के परीक्षण से उसे जाना जाता है। *सत्य और असत्य का विश्लेषण करने के लिए विवेक ही एकमात्र परीक्षा का आधार है। मात्र मान्यताओं, परम्पराओं, शास्त्रीय आप्त वचनों से वस्तुस्थिति को जान सकना अशक्य है।*
👉 *धर्मक्षेत्र का पर्यवेक्षण किया जाये तो पता चलता है कि संसार में हजारों धर्म सम्प्रदाय मत-मतान्तर प्रचलित हैं।* उनकी मान्यतायें एवं परम्परायें एक दूसरे के सर्वथा विपरीत हैं, नैतिकता के थोड़े से सिद्धान्तों पर आंशिक रूप से वे जरूर सहमत होते हैं बाकी सृष्टि के इतिहास से लेकर ईश्वर की आकृति-प्रकृति, अन्त, उपासना तक के सभी प्रतिपादनों में घोर मतभेद है। प्रथा परम्पराओं के सम्बन्ध में कोई तालमेल नहीं, ऐसी दशा में किस शास्त्र को, किस अवतार को सही माना जाय—यह निर्णय नहीं हो सकता।
👉 *प्रत्येक सम्प्रदाय के अनुयायी अपने मार्गदर्शकों के प्रतिपादनों पर इतना कट्टर विश्वास करते हैं कि उनमें से किसी को झुठलाना उनके अनुयायियों को मर्मान्तक पीड़ा पहुंचाने के बराबर है।* सभी मतवादी अपनी मान्यताओं का अपने-अपने ढंग से ऐसा प्रतिपादन करते हैं कि मानों उनका विश्वास ही *एकमात्र सत्य है।* इसका अर्थ हुआ कि *अन्य मतावलम्बी झूठे हैं, जिस एक को सत्य माना जाय वह भी अन्यों की दृष्टि में झूठा है।* फिर परस्पर घोर विपरीतता लिए हुए प्रतिपादनों में से किसी को भी सत्य ठहराते नहीं बनता।
👉 *वह कहानी उपहासास्पद है जिसमें अन्धों ने हाथी के कई अंगों को पकड़कर उसका वर्णन अपने अनुभवों के आधार पर किया था।* इस कहानी में यह बात नहीं है कि *एक ही कान को पकड़कर हर अन्धे ने उसे अलग-अलग प्रकार का बताया था,* यहां तो यही होता देखा जा सकता है। *पशुबलि को ही लें, एक सम्प्रदाय को तो उसके बिना धर्म-कर्म सम्पन्न ही नहीं होता दूसरा जीव हिंसा को धर्म के घोर विपरीत मानता है।* दोनों ही *अपनी-अपनी मान्यताओं पर कट्टर हैं, एक वर्ग ईश्वर को साकार बताता है, दूसरा निराकार।* अपने-अपने *पक्ष की कट्टरता के कारण* अब तक *असंख्यों बार रक्त की नदियां* बहती रही हैं और *विपक्षी को धर्मद्रोही बताकर सिर काटने में ईश्वर की प्रसन्नता* जानी जाती रही है।
👉 *समाधान जब कभी निकलेगा तब विवेक की कसौटी का सहारा लेने पर ही निकलेगा, अन्य सभी क्षेत्रों की तरह धर्मक्षेत्र में भी असली-नकली का समन्वय बेतरह भरा है।* किस धर्म की मान्यताओं में कितना अंश बुद्धि संगत है? यह देखते हुए यदि खिले हुए फूल चुन लिए जाय तो एक सुन्दर गुलदस्ता बन सकता है। *बिना दुराग्रह के यदि सार संग्रह की दृष्टि लेकर चला जाये और प्राचीन-नवीन का भेद न किया जाये तो आज की स्थिति में जो उपयुक्त है उसे सर्वसाधारण के लिए प्रस्तुत किया जा सकेगा।* वही सामयिक एवं सर्वोपयोगी धर्म हो सकेगा, ऐसे सार-संग्रह में विवेक को, तर्क-तथ्य को ही प्रामाणिक मानकर चलना पड़ेगा।
♻ *पं.श्रीराम शर्मा आचार्य*♻
🙏🙏🙏 *सुप्रभात*🙏🙏🙏
🌴//२८फरवरी २०१७ मंगलवार //🌴
🌱फाल्गुन शुक्लपक्ष द्वितीया२०७३ 🌱
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*विवेक ही हमारा सच्चा मार्गदर्शक*
👉 *विवेकशीलता को ही सत्य की प्राप्ति का एकमात्र साधन कहा जा सकता है।* सत्य को नारायण कहा गया है, भगवान का सर्वाधिक सारगर्भित नाम सत्यनारायण है। यथार्थता के हम जितने अधिक निकट पहुंचते हैं भगवान के सान्निध्य का, उसके दर्शन का उतना ही लाभ लेते हैं। *हीरा पेड़ों पर फूल की तरह लटका नहीं मिलता, वह कोयले की गहरी खदानें खोदकर निकालना पड़ता है। सत्य किसी को अनायास ही नहीं मिल जाता, उसे विवेक की कुदाली से खोदकर निकालना पड़ता है।*
👉 दूध और पानी के अलग कर देने की आदत हंस में बताई जाती है। इस कथन में त अलंकार मात्र है, पर यह सत्य है कि *विवेक रूपी हंसवृत्ति उचित और अनुचित के चालू सम्मिश्रण में से यथार्थता को ढूंढ़ निकालती है और उस पर चढ़े हुए कलेवर को उतार फेंकती है।*
शरीर की आंतरिक स्थिति का सामान्यतः कुछ भी पता नहीं चलता, पर रक्त ‘एक्सरे’ मल-मूत्र आदि के परीक्षण से उसे जाना जाता है। *सत्य और असत्य का विश्लेषण करने के लिए विवेक ही एकमात्र परीक्षा का आधार है। मात्र मान्यताओं, परम्पराओं, शास्त्रीय आप्त वचनों से वस्तुस्थिति को जान सकना अशक्य है।*
👉 *धर्मक्षेत्र का पर्यवेक्षण किया जाये तो पता चलता है कि संसार में हजारों धर्म सम्प्रदाय मत-मतान्तर प्रचलित हैं।* उनकी मान्यतायें एवं परम्परायें एक दूसरे के सर्वथा विपरीत हैं, नैतिकता के थोड़े से सिद्धान्तों पर आंशिक रूप से वे जरूर सहमत होते हैं बाकी सृष्टि के इतिहास से लेकर ईश्वर की आकृति-प्रकृति, अन्त, उपासना तक के सभी प्रतिपादनों में घोर मतभेद है। प्रथा परम्पराओं के सम्बन्ध में कोई तालमेल नहीं, ऐसी दशा में किस शास्त्र को, किस अवतार को सही माना जाय—यह निर्णय नहीं हो सकता।
👉 *प्रत्येक सम्प्रदाय के अनुयायी अपने मार्गदर्शकों के प्रतिपादनों पर इतना कट्टर विश्वास करते हैं कि उनमें से किसी को झुठलाना उनके अनुयायियों को मर्मान्तक पीड़ा पहुंचाने के बराबर है।* सभी मतवादी अपनी मान्यताओं का अपने-अपने ढंग से ऐसा प्रतिपादन करते हैं कि मानों उनका विश्वास ही *एकमात्र सत्य है।* इसका अर्थ हुआ कि *अन्य मतावलम्बी झूठे हैं, जिस एक को सत्य माना जाय वह भी अन्यों की दृष्टि में झूठा है।* फिर परस्पर घोर विपरीतता लिए हुए प्रतिपादनों में से किसी को भी सत्य ठहराते नहीं बनता।
👉 *वह कहानी उपहासास्पद है जिसमें अन्धों ने हाथी के कई अंगों को पकड़कर उसका वर्णन अपने अनुभवों के आधार पर किया था।* इस कहानी में यह बात नहीं है कि *एक ही कान को पकड़कर हर अन्धे ने उसे अलग-अलग प्रकार का बताया था,* यहां तो यही होता देखा जा सकता है। *पशुबलि को ही लें, एक सम्प्रदाय को तो उसके बिना धर्म-कर्म सम्पन्न ही नहीं होता दूसरा जीव हिंसा को धर्म के घोर विपरीत मानता है।* दोनों ही *अपनी-अपनी मान्यताओं पर कट्टर हैं, एक वर्ग ईश्वर को साकार बताता है, दूसरा निराकार।* अपने-अपने *पक्ष की कट्टरता के कारण* अब तक *असंख्यों बार रक्त की नदियां* बहती रही हैं और *विपक्षी को धर्मद्रोही बताकर सिर काटने में ईश्वर की प्रसन्नता* जानी जाती रही है।
👉 *समाधान जब कभी निकलेगा तब विवेक की कसौटी का सहारा लेने पर ही निकलेगा, अन्य सभी क्षेत्रों की तरह धर्मक्षेत्र में भी असली-नकली का समन्वय बेतरह भरा है।* किस धर्म की मान्यताओं में कितना अंश बुद्धि संगत है? यह देखते हुए यदि खिले हुए फूल चुन लिए जाय तो एक सुन्दर गुलदस्ता बन सकता है। *बिना दुराग्रह के यदि सार संग्रह की दृष्टि लेकर चला जाये और प्राचीन-नवीन का भेद न किया जाये तो आज की स्थिति में जो उपयुक्त है उसे सर्वसाधारण के लिए प्रस्तुत किया जा सकेगा।* वही सामयिक एवं सर्वोपयोगी धर्म हो सकेगा, ऐसे सार-संग्रह में विवेक को, तर्क-तथ्य को ही प्रामाणिक मानकर चलना पड़ेगा।
♻ *पं.श्रीराम शर्मा आचार्य*♻
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